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Apr 27, 2011

हम तेरे शहर से जाते हैं

हम तेरे शहर से जाते हैं अजनबी की तरह ;
तुम किसी से कभी इस बात का चर्चा करना ।
एक दूजे से कभी शिकवे न गिला करते थे ;
हम जो छुप छुप के अजी छत पे मिला करते थे ;
तुम किसी से कभी इस मुलाक़ात का चर्चा करना ।
हम तेरे शहर से जाते हैं अजनबी की तरह ।
मेरी बसती हुई दुनिया का उजड़ना ऐसे ;
हर हसीं ख़्वाब का बन के बिखरना ऐसे ;
तुम किसी से कभी इस हालात का चर्चा करना ।
हम तेरे शहर से जाते हैं अजनबी की तरह ।
हम छुपायेंगे सदा अपने सभी दर्द-ओ-ग़म ।
डबडबाती हुई आँखों में भरे पानी की क़सम ।
तुम किसी से कभी इन ख्यालात का चर्चा करना ।
हम तेरे शहर से जाते हैं अजनबी की तरह ।
आज के बाद हम कभी मुड़के न आएंगे इधर ;
भटकते ही फिरेंगे किसी और गली और शहर ;
तुम मेरी भटकती हुई क़ायनात का चर्चा करना ।
हम तेरे शहर से जाते हैं अजनबी की तरह ॥








Aug 13, 2010

हारेंगे ना हम हारे हैं

अपनों की तादात बहुत है,
फिर भी ख़ाली जीवन के पल।
हर मौसम बदहाल हुए हैं,
वक़्त गुज़ारा तन्हा बेकल।
किसे सुनाएँ किसकी सुने हम
कोई नहीं है मेरा हमदम;
सुस्त ज़िन्दगी गुज़र रही है,
सुप्त अवस्था में है हलचल।
कष्ट दिए हैं अनुबंधों ने;
मुझको जीवन संबंधों ने;
ख़ुशी की कोशिश रही नाकाम,
टूट गए सब शीशमहल।
मेरे तन में भी इक दिल है;
लेकिन इसके संग मुश्किल है;
ग़ैरों की क्या बात करें हम,
अपने ही करते इसको घायल।
लम्हा भी हो गया है ताजिर;
लिए बिना न होता हाज़िर;
खुदगर्ज़ी की धार में बहके,
करता सारे प्रयास निष्फल।
मुश्किल थी पर कुछ भारी थी;
तन्हाई में खुद्दारी थी;
उलझ गए हम यूँ उलझन में,
निकल सका न कोई भी हल।
हारेंगे ना हम हारे हैं;
अपने नभ के ध्रुव तारे हैं;
राज़ बतायें अब क्या यारों,
पहले भी थे अब भी मुकम्मल।
अपनों की तादात बहुत है,
फिर भी ख़ाली जीवन के पल ..................।।

Aug 12, 2010

शलभ सरीखे

जब जब कुछ भी लूटा हमने,
तब तब कुछ कुछ लुटे भी हम हैं।
घुल मिल घुल मिल रहते रहते,
कभी कभी कुछ कटे भी हम हैं।
बचपन में थी बुद्धि छोटी,
सुख दुःख तब हम समझ न पाए;
युवा काल में स्वप्न सुनहले,
मदमाते से हरदम लहराए;
श्रृंगारित यौवन के स्पर्श से,
तृप्त होने तक सटे भी हम हैं।
जब पहनावे से होते देखा,
जग में मान सम्मान;
हमने भी तब पहने अक्सर,
नए नए परिधान;
लेकिन उसके भीतर भीतर ,
चीथड़ों से फटे भी हम हैं।
आँधी से न डरे कभी भी,
लगा न डर तूफ़ानों से;
गठबंधन जब किया मृत्यु से,
रिश्ता बना शमशानों से;
जब भी वार किया मुसीबतों ने,
डिगे नहीं और डटे भी हम हैं।
क्षण भंगुर से इस जीवन में,
झंझावातों के रहे ठिकाने;
भंवर से उबरे तट में डूबे,
जीवन नइया पार लगाने;
कुछ कुछ तो आराम किया था,
लेकिन ज्यादा खटे भी हम हैं।
हवाओं और तरंगों में हरदम,
निनादित होवे बस ये नारा;
सद्भावों के सौजन्य से फैले,
जन गण मन में भाई चारा;
तभी तो हर त्योहारों पे हरदम,
ख़ुशी मनाने जुटे भी हम हैं ।
अपनी सारी व्यथाओं के संग,
काल धार में बहे बहे हम;
शलभ सरीखे आत्माहुति को,
हरदम ही तैयार रहे हम;
रुष्ट रहे थे अनिर्णय में तो,
निर्णीत पलों में पटे भी हम हैं।